| श्री रामचरितमानस » काण्ड 1: बाल काण्ड » चौपाई 45.2 |
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| | | | काण्ड 1 - चौपाई 45.2  | एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए॥
जागबलिक मुनि परम बिबेकी। भरद्वाज राखे पद टेकी॥2॥ | | | | अनुवाद | | | | मकर संक्रांति का पूरा दिन स्नान करके सभी ऋषिगण अपने आश्रमों को लौट आए। भारद्वाजजी ने परम बुद्धिमान ऋषि याज्ञवल्क्य के चरण पकड़ लिए। | | | | After bathing for the entire Makar Sankranti, all the sages returned to their ashrams. Bharadwajji held the feet of Yagyavalkya, the wisest sage. | |
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