| श्री रामचरितमानस » काण्ड 1: बाल काण्ड » चौपाई 355.3 |
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| | | | काण्ड 1 - चौपाई 355.3  | कहि न सकहिं सतसारद सेसू। बेद बिरंचि महेस गनेसू॥
सो मैं कहौं कवन बिधि बरनी। भूमिनागु सिर धरइ कि धरनी॥3॥ | | | | अनुवाद | | | | सैकड़ों सरस्वती, शेष, वेद, ब्रह्मा, महादेव और गणेश भी इसे नहीं कह सकते। फिर मैं इसका वर्णन कैसे करूँ? क्या केंचुआ भी धरती को अपने सिर पर उठा सकता है? | | | | Hundreds of Saraswatis, Sheshs, Vedas, Brahmas, Mahadevs and Ganeshs cannot even say it. Then how can I describe it? Can an earthworm even carry the earth on its head? | |
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