श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  चौपाई 354.4
 
 
काण्ड 1 - चौपाई 354.4 
जनक राज गुन सीलु बड़ाई। प्रीति रीति संपदा सुहाई॥
बहुबिधि भूप भाट जिमि बरनी। रानीं सब प्रमुदित सुनि करनी॥4॥
 
अनुवाद
 
 राजा ने भाटों की भाँति राजा जनक के गुण, चरित्र, महत्ता, प्रेम और सुख-सम्पत्ति का अनेक प्रकार से वर्णन किया। जनकजी के कार्यों को सुनकर सभी रानियाँ बहुत प्रसन्न हुईं।
 
The king, like a bard, described the virtues, character, importance, love and pleasant wealth of King Janak in many ways. All the queens were very happy to hear the deeds of Janakji.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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