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काण्ड 1 - चौपाई 33.4  |
कलपभेद हरिचरित सुहाए। भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए॥
करिअ न संसय अस उर आनी। सुनिअ कथा सादर रति मानी॥4॥ |
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| अनुवाद |
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| कल्प के भेद के अनुसार ऋषियों ने अनेक प्रकार से श्रीहरि के सुन्दर चरित्रों का गान किया है। ऐसा मन में विचार करके तुम संशय न करो और प्रेम तथा आदरपूर्वक इस कथा को सुनो। |
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| According to the difference in the Kalpa, the sages have sung the beautiful characters of Shri Hari in many ways. Do not doubt by thinking like this in your heart and listen to this story with love and respect. |
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