| श्री रामचरितमानस » काण्ड 1: बाल काण्ड » चौपाई 326.3 |
|
| | | | काण्ड 1 - चौपाई 326.3  | बस्तु अनेक करिअ किमि लेखा। कहि न जाइ जानहिं जिन्ह देखा॥
लोकपाल अवलोकि सिहाने। लीन्ह अवधपति सबु सुखु माने॥3॥ | | | | अनुवाद | | | | (आदि) इतनी सारी वस्तुएँ हैं कि उनकी गणना कैसे की जा सकती है? उनका वर्णन नहीं किया जा सकता, जिन्होंने उन्हें देखा है, वे ही जानते हैं। उन्हें देखकर लोकपाल भी दंग रह गए। अवधराज दशरथजी ने बड़ी प्रसन्नता के साथ सब कुछ सहर्ष स्वीकार कर लिया। | | | | (Etc.) There are so many things, how can they be counted. They cannot be described, only those who have seen them know. Seeing them, even Lokpal was stunned. Awadhraj Dashrathji accepted everything happily with great joy. | |
| | ✨ ai-generated | | |
|
|