| श्री रामचरितमानस » काण्ड 1: बाल काण्ड » चौपाई 266.3 |
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| | | | काण्ड 1 - चौपाई 266.3  | जौं बिदेहु कछु करै सहाई। जीतहु समर सहित दोउ भाई॥
साधु भूप बोले सुनि बानी। राजसमाजहि लाज लजानी॥3॥ | | | | अनुवाद | | | | यदि जनक किसी प्रकार तुम्हारी सहायता करें, तो तुम अपने दोनों भाइयों सहित उसे युद्ध में परास्त कर सकते हो।'' ये वचन सुनकर साधु राजा ने कहा- इस (निर्लज्ज) राजसभा को देखकर शील भी लज्जित हो गया है। | | | | If Janak helps you in some way, then you can defeat him along with your two brothers in the war. Hearing these words, the saintly king said- Seeing this (shameless) royal society, even modesty has become ashamed. | |
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