| श्री रामचरितमानस » काण्ड 1: बाल काण्ड » चौपाई 251.2 |
|
| | | | काण्ड 1 - चौपाई 251.2  | सब नृप भए जोगु उपहासी। जैसें बिनु बिराग संन्यासी॥
कीरति बिजय बीरता भारी। चले चाप कर बरबस हारी॥2॥ | | | | अनुवाद | | | | सभी राजा उपहास के पात्र हो गए, जैसे त्यागहीन साधु उपहास के पात्र हो जाते हैं। यश, विजय, महान पराक्रम - ये सब उन्होंने धनुष के हाथों खो दिए। | | | | All the kings became worthy of ridicule, just as a hermit without renunciation becomes worthy of ridicule. Fame, victory, great bravery - they lost all these at the hands of the bow. | |
| | ✨ ai-generated | | |
|
|