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काण्ड 1 - चौपाई 228.4  |
एक सखी सिय संगु बिहाई। गई रही देखन फुलवाई॥
तेहिं दोउ बंधु बिलोके जाई। प्रेम बिबस सीता पहिं आई॥4॥ |
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| अनुवाद |
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| एक सखी सीताजी का साथ छोड़कर पुष्प वाटिका देखने चली गई। उसने जाकर दोनों भाइयों को देखा और प्रेम से विह्वल होकर सीताजी के पास आई। |
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| A friend left Sitaji's company and went to see the flower garden. She went and saw the two brothers and came to Sitaji overwhelmed with love. |
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