| श्री रामचरितमानस » काण्ड 1: बाल काण्ड » चौपाई 220.3 |
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| | | | काण्ड 1 - चौपाई 220.3  | कहहिं परसपर बचन सप्रीती। सखि इन्ह कोटि काम छबि जीती॥
सुर नर असुर नाग मुनि माहीं। सोभा असि कहुँ सुनिअति नाहीं॥3॥ | | | | अनुवाद | | | | वे आपस में बड़े प्रेम से बातें कर रहे हैं- हे मित्र! इसने करोड़ों कामदेवों की सुन्दरता को जीत लिया है। ऐसी सुन्दरता देवताओं, मनुष्यों, दानवों, नागों और ऋषियों में भी नहीं सुनी जाती। | | | | They are talking to each other with great love- O friend! He has conquered the beauty of millions of Kamadevas. Such beauty is not even heard of among gods, humans, demons, serpents and sages. | |
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