श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  चौपाई 218.4
 
 
काण्ड 1 - चौपाई 218.4 
सुनि मुनीसु कह बचन सप्रीती। कस न राम तुम्ह राखहु नीती॥
धरम सेतु पालक तुम्ह ताता। प्रेम बिबस सेवक सुखदाता॥4॥
 
अनुवाद
 
 यह सुनकर ऋषि विश्वामित्र प्रेमपूर्वक बोले- हे राम! हे प्रिय! आप नीति की रक्षा कैसे नहीं कर सकते? आप तो धर्म की मर्यादा का पालन करने वाले और प्रेम के वशीभूत होकर सेवकों को सुख देने वाले हैं।
 
Hearing this, sage Vishwamitra spoke with love- O Ram! How can you not protect the policy, O dear! You are the one who follows the limits of religion and gives happiness to the servants under the influence of love.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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