| श्री रामचरितमानस » काण्ड 1: बाल काण्ड » चौपाई 218.3 |
|
| | | | काण्ड 1 - चौपाई 218.3  | नाथ लखनु पुरु देखन चहहीं। प्रभु सकोच डर प्रगट न कहहीं॥
जौं राउर आयसु मैं पावौं। नगर देखाइ तुरत लै आवौं॥3॥ | | | | अनुवाद | | | | हे प्रभु! लक्ष्मण नगर देखना चाहते हैं, किन्तु प्रभु के भय और संकोच के कारण वे स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कह पाते। यदि आपकी आज्ञा हो, तो मैं उन्हें नगर दिखाकर शीघ्र ही वापस ले आऊँगा। | | | | O Lord! Lakshmana wants to see the city, but due to fear and hesitation of the Lord he does not say anything clearly. If I get your permission, I will show him the city and bring him back immediately. | |
| | ✨ ai-generated | | |
|
|