श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  चौपाई 205.4
 
 
काण्ड 1 - चौपाई 205.4 
प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा॥
आयसु मागि करहिं पुर काजा। देखि चरित हरषइ मन राजा॥4॥
 
अनुवाद
 
 श्री रघुनाथजी प्रातःकाल उठकर माता-पिता और गुरु को प्रणाम करते हैं और उनकी अनुमति लेकर नगर का काम करते हैं। उनका चरित्र देखकर राजा मन ही मन बहुत प्रसन्न होते हैं।
 
Sri Raghunathji wakes up in the morning, bows his head to his parents and Guru and after taking their permission, does the work of the city. Seeing his character, the king is very happy in his heart.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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