| श्री रामचरितमानस » काण्ड 1: बाल काण्ड » चौपाई 189.2 |
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| | | | काण्ड 1 - चौपाई 189.2  | निज दुख सुख सब गुरहि सुनायउ। कहि बसिष्ठ बहुबिधि समुझायउ॥
धरहु धीर होइहहिं सुत चारी। त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी॥2॥ | | | | अनुवाद | | | | राजा ने अपने सुख-दुःख की सारी कथा अपने गुरु को सुनाई। गुरु वशिष्ठ ने उन्हें अनेक प्रकार से समझाया (और कहा-) धैर्य रखो, तुम्हारे चार पुत्र होंगे, जो तीनों लोकों में विख्यात होंगे और भक्तों का भय दूर करेंगे। | | | | The king told his entire story of his happiness and sorrow to his Guru. Guru Vashishtha explained to him in many ways (and said-) Be patient, you will have four sons, who will be famous in all the three worlds and will remove the fear of devotees. | |
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