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काण्ड 1 - चौपाई 188.3  |
गिरि कानन जहँ तहँ भरि पूरी। रहे निज निज अनीक रचि रूरी॥
यह सब रुचिर चरित मैं भाषा। अब सो सुनहु जो बीचहिं राखा॥3॥ |
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| अनुवाद |
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| वे (वानर) अपनी-अपनी सुन्दर सेनाएँ बनाकर पर्वतों और वनों में सर्वत्र फैल गए। ये सब सुन्दर कथाएँ मैंने कही हैं। अब वह कथा सुनो जो मैंने बीच में छोड़ दी थी। |
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| They (monkeys) formed their own beautiful armies and spread themselves everywhere in the mountains and forests. I have told all these beautiful stories. Now listen to the story which I left in the middle. |
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