| श्री रामचरितमानस » काण्ड 1: बाल काण्ड » चौपाई 171.3 |
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| | | | काण्ड 1 - चौपाई 171.3  | कुल समेत रिपु मूल बहाई। चौथें दिवस मिलब मैं आई॥
तापस नृपहि बहुत परितोषी। चला महाकपटी अतिरोषी॥3॥ | | | | अनुवाद | | | | मैं शत्रु को उसके कुल सहित उखाड़कर चौथे दिन (आज से) तुमसे मिलने आऊँगा।’ तपस्वी राजा को बहुत सान्त्वना देकर वह महान मायावी और अत्यन्त क्रोधी राक्षस वहाँ से चला गया। | | | | Having uprooted the enemy along with his clan, I shall come and meet you on the fourth day (from today). After consoling the ascetic king a lot, that great illusionist and extremely angry demon left. | |
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