| श्री रामचरितमानस » काण्ड 1: बाल काण्ड » चौपाई 168.4 |
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| | | | काण्ड 1 - चौपाई 168.4  | पुनि तिन्ह के गृह जेवँइ जोऊ। तव बस होइ भूप सुनु सोऊ॥
जाइ उपाय रचहु नृप एहू। संबत भरि संकलप करेहू॥4॥ | | | | अनुवाद | | | | इतना ही नहीं, जो कोई इनके घर भोजन करेगा, हे राजन! सुनो, वह भी तुम्हारा अधीन हो जाएगा। हे राजन! तुम जाकर ऐसा करो कि वर्ष भर अन्नदान का संकल्प करो। | | | | Not only this, whoever eats food at their house, O King! Listen, he too will become your subordinate. O King! Go and do this and resolve to provide food throughout the year. | |
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