| श्री रामचरितमानस » काण्ड 1: बाल काण्ड » चौपाई 160.3 |
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| | | | काण्ड 1 - चौपाई 160.3  | तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना। भूप सुहृद सो कपट सयाना॥
बैरी पुनि छत्री पुनि राजा। छल बल कीन्ह चहइ निज काजा॥3॥ | | | | अनुवाद | | | | राजा ने उसे नहीं पहचाना, पर उसने राजा को पहचान लिया। राजा शुद्ध हृदय का था और छल-कपट में भी चतुर था। पहले वह शत्रु था, फिर जाति से क्षत्रिय, फिर राजा। वह छल-कपट और बल से अपना काम निकलवाना चाहता था। | | | | The king did not recognize him, but he recognized the king. The king was pure hearted and he was clever in deceit. First he was an enemy, then a Kshatriya by caste, then the king. He wanted to get his work done by deceit and force. | |
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