| श्री रामचरितमानस » काण्ड 1: बाल काण्ड » चौपाई 146.3 |
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| | | | काण्ड 1 - चौपाई 146.3  | जो भुसुंडि मन मानस हंसा। सगुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा॥
देखहिं हम सो रूप भरि लोचन। कृपा करहु प्रनतारति मोचन॥3॥ | | | | अनुवाद | | | | जो काकभुशुण्डि के मन रूपी अभिमान रूपी सरोवर में विचरण करने वाला हंस है, वेद जिनकी सगुण और निर्गुण कहकर स्तुति करते हैं, हे शरणागतों के दुःखों को दूर करने वाले प्रभु! कृपा करके हमें भी आँसुओं से भरे नेत्रों से उस रूप का दर्शन करने की कृपा प्रदान कीजिए। | | | | He who is the swan that roams in the lake of pride in the mind of Kakabhushundi, whom the Vedas praise by calling him Saguna and Nirguna, O Lord who removes the sorrows of those who surrender! Kindly bless us to see that form with our eyes filled with tears. | |
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