| श्री रामचरितमानस » काण्ड 1: बाल काण्ड » चौपाई 120a.2 |
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| | | | काण्ड 1 - चौपाई 120a.2  | नाथ कृपाँ अब गयउ बिषादा। सुखी भयउँ प्रभु चरन प्रसादा॥
अब मोहि आपनि किंकरि जानी। जदपि सहज जड़ नारि अयानी॥2॥ | | | | अनुवाद | | | | हे नाथ! आपकी कृपा से मेरा दुःख दूर हो गया है और आपके चरणों की कृपा से मैं सुखी हो गई हूँ। यद्यपि मैं स्त्री होकर स्वभाव से मूर्ख और अज्ञानी हूँ, फिर भी अब आप मुझे अपनी दासी मानते हैं- | | | | O Nath! By your grace, my sorrow has gone away and by the grace of your feet I have become happy. Although being a woman, I am foolish and ignorant by nature, yet now you consider me your maid- | |
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