श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  चौपाई 12.5
 
 
काण्ड 1 - चौपाई 12.5 
कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ॥
कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा॥5॥
 
अनुवाद
 
 मैं न तो कवि हूँ, न चतुर कहलाऊँ, मैं तो अपनी बुद्धि के अनुसार श्री रामजी का गुणगान करता हूँ। कहाँ श्री रघुनाथजी के अपार चरित्र और कहाँ संसार में लीन मेरी बुद्धि!
 
I am neither a poet nor am I called clever, I sing the praises of Shri Ramji according to my intelligence. Where is the immense character of Shri Raghunathji and where is my intelligence engrossed in the world!
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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