श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  चौपाई 110.4
 
 
काण्ड 1 - चौपाई 110.4 
बन बसि कीन्हे चरित अपारा। कहहु नाथ जिमि रावन मारा॥
राज बैठि कीन्हीं बहु लीला। सकल कहहु संकर सुखसीला॥4॥
 
अनुवाद
 
 हे नाथ! फिर वन में रहकर उन्होंने जो महान् कर्म किये तथा रावण का वध किया, वह सब मुझसे कहिए। हे सुखस्वरूप शंकर! फिर सिंहासन पर बैठकर उन्होंने जो-जो कर्म किये, वे सब मुझसे कहिए।
 
O Nath! Then tell me about the great deeds he did while living in the forest and the way he killed Ravana. O Shankar, who is the embodiment of happiness! Then tell me about all the deeds he did while sitting on the throne.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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