| श्री रामचरितमानस » काण्ड 1: बाल काण्ड » चौपाई 10a.4 |
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| | | | काण्ड 1 - चौपाई 10a.4  | जदपि कबित रस एकउ नाहीं। राम प्रताप प्रगट एहि माहीं॥
सोइ भरोस मोरें मन आवा। केहिं न सुसंग बड़प्पनु पावा॥4॥ | | | | अनुवाद | | | | यद्यपि मेरी इस रचना में काव्यात्मकता नहीं है, फिर भी इसमें श्री रामजी की महिमा का दर्शन होता है। मेरे मन में यही विश्वास है। सत्संगति से किसको महानता प्राप्त नहीं हुई है? | | | | Though this composition of mine does not have any poetic flavour, yet it shows the glory of Shri Ramji. This is the only belief in my mind. Who has not attained greatness through good company? | |
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