Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 9.65.29-30h: यद्यपि मैंने उन अनन्त तेजस्वी श्रीकृष्ण के अद्भुत प्रभाव को स्वीकार किया है, तथापि मैंने उनकी प्रेरणा से जिस क्षत्रिय धर्म का भली-भाँति पालन किया है, उससे मैं कभी विचलित नहीं हुआ हूँ। मैंने उस धर्म का फल प्राप्त कर लिया है; अतः मैं किसी प्रकार के शोक का पात्र नहीं हूँ॥29 1/2॥ | mahabharat अध्याय 9.65: दुर्योधनकी दशा देखकर अश्वत्थामाका विषाद, प्रतिज्ञा और सेनापतिके पदपर अभिषेक । mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
मन्यमान: प्रभावं च कृष्णस्यामिततेजस:।
तेन न च्यावितश्चाहं क्षत्रधर्मात् स्वनुष्ठितात्॥ २९॥
स मया समनुप्राप्तो नास्मि शोच्य: कथंचन।
अनुवाद
यद्यपि मैंने उन अनन्त तेजस्वी श्रीकृष्ण के अद्भुत प्रभाव को स्वीकार किया है, तथापि मैंने उनकी प्रेरणा से जिस क्षत्रिय धर्म का भली-भाँति पालन किया है, उससे मैं कभी विचलित नहीं हुआ हूँ। मैंने उस धर्म का फल प्राप्त कर लिया है; अतः मैं किसी प्रकार के शोक का पात्र नहीं हूँ॥29 1/2॥
Even though I have acknowledged the wonderful influence of the infinitely radiant Sri Krishna, I have never deviated from the Kshatriya Dharma which I have followed well under his inspiration. I have received the fruits of that Dharma; hence I am not worthy of any grief.॥ 29 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥