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mahabharat 9.65.25: फिर भी मुझे इस बात का आनन्द है कि चाहे कितनी ही कठिनाइयाँ क्यों न आईं, मैं युद्ध में कभी पीछे नहीं हटा। पापियों ने जब मुझे मारा भी, तो छल से मारा॥ 25॥   |   mahabharat अध्याय 9.65: दुर्योधनकी दशा देखकर अश्वत्थामाका विषाद, प्रतिज्ञा और सेनापतिके पदपर अभिषेक   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 65: दुर्योधनकी दशा देखकर अश्वत्थामाका विषाद, प्रतिज्ञा और सेनापतिके पदपर अभिषेक  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  9.65.25 
दिष्ट्या नाहं परावृत्तो युद्धे कस्यांचिदापदि।
दिष्ट्याहं निहत: पापैश्छलेनैव विशेषत:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
फिर भी मुझे इस बात का आनन्द है कि चाहे कितनी ही कठिनाइयाँ क्यों न आईं, मैं युद्ध में कभी पीछे नहीं हटा। पापियों ने जब मुझे मारा भी, तो छल से मारा॥ 25॥
 
‘Still I am happy that no matter what difficulties I faced, I never backed down in the war. Even when the sinners killed me, they did so by deceit.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)