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mahabharat 9.65.15: हे भरतश्रेष्ठ! मैं न तो दु:शासन को देख पा रहा हूँ, न ही महाबली कर्ण को। मैं अन्य सभी मित्रों को भी नहीं देख पा रहा हूँ। यह क्या है?॥ 15॥   |   mahabharat अध्याय 9.65: दुर्योधनकी दशा देखकर अश्वत्थामाका विषाद, प्रतिज्ञा और सेनापतिके पदपर अभिषेक   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 65: दुर्योधनकी दशा देखकर अश्वत्थामाका विषाद, प्रतिज्ञा और सेनापतिके पदपर अभिषेक  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  9.65.15 
दु:शासनं न पश्यामि नापि कर्णं महारथम्।
नापि तान् सुहृद: सर्वान् किमिदं भरतर्षभ॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! मैं न तो दु:शासन को देख पा रहा हूँ, न ही महाबली कर्ण को। मैं अन्य सभी मित्रों को भी नहीं देख पा रहा हूँ। यह क्या है?॥ 15॥
 
‘Bhaarat's best! I am not able to see either Dushasan or the mighty warrior Karna. I am not able to see all the other friends also. What is this?॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)