श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 63: युधिष्ठिरकी प्रेरणासे श्रीकृष्णका हस्तिनापुरमें जाकर धृतराष्ट्र और गान्धारीको आश्वासन दे पुन: पाण्डवोंके पास लौट आना  »  श्लोक 71-73
 
 
श्लोक  9.63.71-73 
ततस्त्वरित उत्थाय पादौ मूर्ध्ना प्रणम्य च॥ ७१॥
द्वैपायनस्य राजेन्द्र तत: कौरवमब्रवीत्।
आपृच्छे त्वां कुरुश्रेष्ठ मा च शोके मन: कृथा:॥ ७२॥
द्रौणे: पापोऽस्त्यभिप्रायस्तेनास्मि सहसोत्थित:।
पाण्डवानां वधे रात्रौ बुद्धिस्तेन प्रदर्शिता॥ ७३॥
 
 
अनुवाद
राजन! तत्पश्चात वे सहसा उठ खड़े हुए और व्यासजी के चरणों में सिर नवाकर कुरुवंश के राजा धृतराष्ट्र से बोले - 'हे कौरवश्रेष्ठ! अब मैं आपसे प्रस्थान की अनुमति चाहता हूँ। अब आप अपने मन को शोक से मत भरिए। द्रोणपुत्र अश्वत्थामा के मन में पाप का विचार उत्पन्न हो गया है। इसीलिए मैं सहसा उठ खड़ा हुआ हूँ। उसने रात्रि में सोते समय पाण्डवों को मार डालने का विचार किया है।'
 
King! Thereafter he suddenly stood up and bowing his head in front of Vyasji's feet, he said to Dhritarashtra, the king of the Kuru dynasty - 'O best of the Kurus! Now I want your permission to leave. Now do not let your mind be filled with grief. A sinful thought has arisen in the mind of Drona's son Ashwatthama. That is why I have suddenly got up. He has thought of killing the Pandavas while sleeping at night.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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