श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 63: युधिष्ठिरकी प्रेरणासे श्रीकृष्णका हस्तिनापुरमें जाकर धृतराष्ट्र और गान्धारीको आश्वासन दे पुन: पाण्डवोंके पास लौट आना  »  श्लोक 57-58h
 
 
श्लोक  9.63.57-58h 
ह्रिया च परयाऽऽविष्टो भवन्तं नाधिगच्छति॥ ५७॥
पुत्रशोकाभिसंतप्तं बुद्धिव्याकुलितेन्द्रियम्।
 
 
अनुवाद
‘आप अपने पुत्र के वियोग के शोक से अत्यन्त व्याकुल हैं। आपकी बुद्धि और इन्द्रियाँ शोक से व्याकुल हैं। ऐसी दशा में वे अत्यन्त लज्जित होने के कारण आपके सम्मुख नहीं आ रही हैं।’॥57 1/2॥
 
‘You are completely distressed by the grief of losing your son. Your intellect and senses are troubled by grief. In such a condition, they are not coming in front of you because they are extremely ashamed.’॥ 57 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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