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श्लोक 9.63.47-48  |
कालोपहतचित्ता हि सर्वे मुह्यन्ति भारत॥ ४७॥
यथा मूढो भवान् पूर्वमस्मिन्नर्थे समुद्यते।
किमन्यत् कालयोगाद्धि दिष्टमेव परायणम्॥ ४८॥ |
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| अनुवाद |
| भारत! जो लोग काल के प्रभाव से भ्रष्ट हो जाते हैं, वे सब मोह के शिकार हो जाते हैं। जैसे तुम्हारा मन भी प्रथम युद्ध की तैयारी करते समय मोहग्रस्त हो गया था। इसे काल के प्रभाव के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है? भाग्य ही सबसे बड़ा आश्रय है। ॥47-48॥ |
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| Bharat! All those whose minds are corrupted by the effect of time, fall prey to delusion. Just as your mind too was deluded while preparing for the first war. What else can this be called except the influence of time? Destiny is the greatest refuge. ॥ 47-48॥ |
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