श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 63: युधिष्ठिरकी प्रेरणासे श्रीकृष्णका हस्तिनापुरमें जाकर धृतराष्ट्र और गान्धारीको आश्वासन दे पुन: पाण्डवोंके पास लौट आना  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  9.63.17-18 
त्वया देवासुरे युद्धे वधार्थममरद्विषाम्।
यथा साह्यं पुरा दत्तं हताश्च विबुधद्विष:॥ १७॥
साह्यं तथा महाबाहो दत्तमस्माकमच्युत।
सारथ्येन च वार्ष्णेय भवता हि धृता वयम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
‘जैसे पूर्वकाल में देवताओं और दानवों के युद्ध में देवताओं के शत्रु दैत्यों को मारने में तुमने देवताओं की सहायता की थी, जिससे देवताओं के समस्त शत्रु मारे गए थे, हे महाबाहु अच्युत! उसी प्रकार तुमने इस युद्ध में हमारी सहायता की है। हे वृष्णिपुत्र! तुमने सारथी बनकर हमारी रक्षा की है।॥ 17-18॥
 
‘Just as you had helped the gods in killing the enemy demons of the gods in the past during the war between gods and demons, due to which all the enemies of the gods were killed, O mighty-armed Achyuta! In the same way, you have helped us in this war. O son of Vrishni! You saved us by acting as a charioteer.॥ 17-18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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