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वासुदेव उवाच
अस्त्रैर्बहुविधैर्दग्ध: पूर्वमेवायमर्जुन।
मदधिष्ठितत्वात् समरे न विशीर्ण: परंतप॥ १८॥
अनुवाद
श्रीकृष्ण बोले - हे शत्रुओं को पीड़ा देने वाले अर्जुन! यह रथ अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से पहले ही जला हुआ था; किन्तु मेरे इसमें बैठे होने के कारण यह जलकर युद्धभूमि में नहीं गिरा।
Shri Krishna said - O Arjuna, the tormentor of enemies! This chariot had already been burnt by various types of weapons; but because I was sitting in it, it did not get burnt and fall in the battlefield.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥