श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 60: क्रोधमें भरे हुए बलरामको श्रीकृष्णका समझाना और युुधिष्ठिरके साथ श्रीकृष्णकी तथा भीमसेनकी बातचीत  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  9.60.37 
भीमसेनस्य तद् दु:खमतीव हृदि वर्तते।
इति संचिन्त्य वार्ष्णेय मयैतत् समुपेक्षितम्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
वृष्णिनन्दन! भीमसेन इन सब बातों से मन में बहुत दुःखी हुए। यही सोचकर मैंने उनके कार्य की उपेक्षा कर दी है।
 
Vrishninandan! Bhimasena was very sad in his heart for all these things. Thinking this, I have ignored his work. 37.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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