श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 60: क्रोधमें भरे हुए बलरामको श्रीकृष्णका समझाना और युुधिष्ठिरके साथ श्रीकृष्णकी तथा भीमसेनकी बातचीत  »  श्लोक 33-34
 
 
श्लोक  9.60.33-34 
वासुदेव उवाच
धर्मराज किमर्थं त्वमधर्ममनुमन्यसे।
हतबन्धोर्यदेतस्य पतितस्य विचेतस:॥ ३३॥
दुर्योधनस्य भीमेन मृद्यमानं शिर: पदा।
उपप्रेक्षसि कस्मात् त्वं धर्मज्ञ: सन्नराधिप॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
श्रीकृष्ण ने पूछा - धर्मराज! आप चुपचाप अन्याय का समर्थन क्यों कर रहे हैं? नरराज दुर्योधन के भाई और सहायक मारे जा चुके हैं। वह भूमि पर गिरकर अचेत हो रहा है। ऐसी स्थिति में भीमसेन उसके सिर को पैरों से कुचल रहे हैं। धर्म के ज्ञाता होकर भी आप यह सब निकट से कैसे देख रहे हैं? 33-34
 
Shri Krishna asked - Dharmaraj! Why are you silently approving of injustice? The brothers and helpers of the king of men Duryodhan have been killed. He is falling on the ground and becoming unconscious. In such a condition, Bhimsena is crushing his head with his feet. Being a knower of Dharma, how are you seeing all this from close quarters? 33-34.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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