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mahabharat 9.6.7-17h: राजा! तब आपका पुत्र दुर्योधन रथ पर बैठकर अश्वत्थामा के पास गया। अश्वत्थामा योद्धाओं में श्रेष्ठ है, युद्ध-संबंधी सभी भावों को जानता है और युद्ध में यमराज के समान भयंकर है। उसके शरीर के अंग सुंदर हैं, सिर बालों से ढका हुआ है और गर्दन शंख के समान सुशोभित है। वह मधुर वाणी बोलता है। उसके नेत्र खिले हुए कमल के पत्ते के समान सुंदर हैं और मुख व्याघ्र के समान भयानक है। उसका भार मेरु पर्वत के समान है। कंधे, नेत्र, गति और वाणी में वह भगवान शंकर के वाहन वृषभ के समान है। उसकी भुजाएँ सुदृढ़, सुगठित और विशाल हैं। वक्षस्थल का उत्तम भाग भी चौड़ा है। बल और वेग में वह गरुड़ और वायु के समान है। वह तेज में सूर्य के समान और बुद्धि में शुक्राचार्य के समान है। कांति, रूप और मुख की शोभा में - वह चंद्रमा के समान है। उसका शरीर सुवर्णमय रत्नों के ढेर के समान सुशोभित है। अंगों के जोड़ भी सुडौल हैं। जंघाएँ, कमर और पिंडलियाँ सुंदर और गोल हैं। उसके दोनों पैर सुंदर हैं। अँगुलियाँ और नख भी सुन्दर हैं, मानो विधाता ने बार-बार शुभ गुणों का स्मरण करके बड़ी सावधानी से उसके अंगों की रचना की हो। वह समस्त शुभ गुणों से युक्त, समस्त कार्यों में कुशल और वैदिक ज्ञान का सागर है। अश्वत्थामा अपने शत्रुओं को बड़े वेग से परास्त करने में समर्थ है। किन्तु शत्रुओं के लिए उसे बलपूर्वक परास्त करना असम्भव है। वह चारों अंगों सहित धनुर्वेद और दस अंगों सहित धनुर्वेद का ज्ञाता है। वह चारों अंगों सहित चारों वेदों और इतिहास तथा पुराण रूपी पाँचवें वेद का भी पारंगत है। महातपस्वी अश्वत्थामा को उसके पिता द्रोणाचार्य ने बड़ी सावधानी और कठोर व्रतों तथा त्रिनेत्रधारी भगवान शंकर की आराधना द्वारा अयोनिजा कृपी के गर्भ से उत्पन्न किया था। उसके कर्म अतुलनीय हैं। इस पृथ्वी पर उसकी कोई अनुपम सुन्दरता नहीं है। वह समस्त विषयों का निपुण विद्वान और गुणों का सागर है। उस अपरिग्रही अश्वत्थामा के पास जाकर आपके पुत्र दुर्योधन ने इस प्रकार कहा -॥ 7-16 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 9.6: दुर्योधनके पूछनेपर अश्वत्थामाका शल्यको सेनापति बनानेके लिये प्रस्ताव, दुर्योधनका शल्यसे अनुरोध और शल्यद्वारा उसकी स्वीकृति   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 6: दुर्योधनके पूछनेपर अश्वत्थामाका शल्यको सेनापति बनानेके लिये प्रस्ताव, दुर्योधनका शल्यसे अनुरोध और शल्यद्वारा उसकी स्वीकृति  »  श्लोक 7-17h
 
 
श्लोक  9.6.7-17h 
ततो दुर्योधन: स्थित्वा रथे रथवरोत्तमम्।
सर्वयुद्धविभावज्ञमन्तकप्रतिमं युधि॥ ७॥
स्वङ्गं प्रच्छन्नशिरसं कम्बुग्रीवं प्रियंवदम्।
व्याकोशपद्मपत्राक्षं व्याघ्रास्यं मेरुगौरवम्॥ ८॥
स्थाणोर्वृषस्य सदृशं स्कन्धनेत्रगतिस्वरै:।
पुष्टश्लिष्टायतभुजं सुविस्तीर्णवरोरसम्॥ ९॥
बले जवे च सदृशमरुणानुजवातयो:।
आदित्यस्यार्चिषा तुल्यं बुद्धॺा चोशनसा समम्॥ १०॥
कान्तिरूपमुखैश्वर्यैस्त्रिभिश्चन्द्रमसा समम्।
काञ्चनोपलसंघातै: सदृशं श्लिष्टसंधिकम्॥ ११॥
सुवृत्तोरुकटीजङ्घं सुपादं स्वङ्गुलीनखम्।
स्मृत्वा स्मृत्वैव तु गुणान् धात्रा यत्नाद् विनिर्मितम्॥ १२॥
सर्वलक्षणसम्पन्नं निपुणं श्रुतिसागरम्।
जेतारं तरसारीणामजेयमरिभिर्बलात् ॥ १३॥
दशाङ्गं यश्चतुष्पादमिष्वस्त्रं वेद तत्त्वत:।
साङ्गांस्तु चतुरो वेदान् सम्यगाख्यानपञ्चमान्॥ १४॥
आराध्य त्र्यम्बकं यत्नाद् व्रतैरुग्रैर्महातपा:।
अयोनिजायामुत्पन्नो द्रोणेनायोनिजेन य:॥ १५॥
तमप्रतिमकर्माणं रूपेणाप्रतिमं भुवि।
पारगं सर्वविद्यानां गुणार्णवमनिन्दितम्॥ १६॥
तमभ्येत्यात्मजस्तुभ्यमश्वत्थामानमब्रवीत्।
 
 
अनुवाद
राजा! तब आपका पुत्र दुर्योधन रथ पर बैठकर अश्वत्थामा के पास गया। अश्वत्थामा योद्धाओं में श्रेष्ठ है, युद्ध-संबंधी सभी भावों को जानता है और युद्ध में यमराज के समान भयंकर है। उसके शरीर के अंग सुंदर हैं, सिर बालों से ढका हुआ है और गर्दन शंख के समान सुशोभित है। वह मधुर वाणी बोलता है। उसके नेत्र खिले हुए कमल के पत्ते के समान सुंदर हैं और मुख व्याघ्र के समान भयानक है। उसका भार मेरु पर्वत के समान है। कंधे, नेत्र, गति और वाणी में वह भगवान शंकर के वाहन वृषभ के समान है। उसकी भुजाएँ सुदृढ़, सुगठित और विशाल हैं। वक्षस्थल का उत्तम भाग भी चौड़ा है। बल और वेग में वह गरुड़ और वायु के समान है। वह तेज में सूर्य के समान और बुद्धि में शुक्राचार्य के समान है। कांति, रूप और मुख की शोभा में - वह चंद्रमा के समान है। उसका शरीर सुवर्णमय रत्नों के ढेर के समान सुशोभित है। अंगों के जोड़ भी सुडौल हैं। जंघाएँ, कमर और पिंडलियाँ सुंदर और गोल हैं। उसके दोनों पैर सुंदर हैं। अँगुलियाँ और नख भी सुन्दर हैं, मानो विधाता ने बार-बार शुभ गुणों का स्मरण करके बड़ी सावधानी से उसके अंगों की रचना की हो। वह समस्त शुभ गुणों से युक्त, समस्त कार्यों में कुशल और वैदिक ज्ञान का सागर है। अश्वत्थामा अपने शत्रुओं को बड़े वेग से परास्त करने में समर्थ है। किन्तु शत्रुओं के लिए उसे बलपूर्वक परास्त करना असम्भव है। वह चारों अंगों सहित धनुर्वेद और दस अंगों सहित धनुर्वेद का ज्ञाता है। वह चारों अंगों सहित चारों वेदों और इतिहास तथा पुराण रूपी पाँचवें वेद का भी पारंगत है। महातपस्वी अश्वत्थामा को उसके पिता द्रोणाचार्य ने बड़ी सावधानी और कठोर व्रतों तथा त्रिनेत्रधारी भगवान शंकर की आराधना द्वारा अयोनिजा कृपी के गर्भ से उत्पन्न किया था। उसके कर्म अतुलनीय हैं। इस पृथ्वी पर उसकी कोई अनुपम सुन्दरता नहीं है। वह समस्त विषयों का निपुण विद्वान और गुणों का सागर है। उस अपरिग्रही अश्वत्थामा के पास जाकर आपके पुत्र दुर्योधन ने इस प्रकार कहा -॥ 7-16 1/2॥
 
King! Then your son Duryodhan sat on the chariot and went near Ashwatthama. Ashwatthama is the best among the warriors, knows all the different emotions related to war and is as fearsome as Yamaraja in war. His body parts are beautiful, head is covered with hair and neck is decorated like a conch. He speaks sweet words. His eyes are beautiful like a blooming lotus leaf and face is as fearsome as a tiger. He has the heaviness of Mount Meru. In shoulders, eyes, speed and voice he is like the bull, the vehicle of Lord Shankar. His arms are strong, well-built and large. The best part of the chest is also wide. He is equal to Garuda and Vayu in strength and speed. He is like the Sun in brightness and Shukracharya in intelligence. In radiance, form and beauty of face – he is like the moon. His body is decorated like a pile of golden stones. The joints of the limbs are also well-formed. The thighs, waist and calves are beautiful and round. Both his feet are beautiful. The fingers and nails are also beautiful, as if the creator has created his limbs with great care by remembering the good qualities again and again. He is endowed with all auspicious qualities, skilled in all works and is an ocean of Vedic knowledge. Ashwatthama is capable of defeating his enemies with great speed. But it is impossible for the enemies to defeat him by force. He knows the Dhanurveda with all four parts and all the ten parts. He is also well versed in the four Vedas with all six parts and the fifth Veda in the form of history and Purana. The great ascetic Ashwatthama was born from the womb of the ayonija Kripi by his father Dronacharya with great care and by performing strict fasts and worshipping the three-eyed Lord Shankar. His deeds are incomparable. He is blessed with unmatched beauty on this earth. He is an expert scholar of all the subjects and an ocean of virtues. Going near that unrepentant Ashwatthama, your son Duryodhana said thus -॥ 7-16 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)