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mahabharat 9.58.15: ‘यदि युद्ध में प्राण बचाने के लिए बचे हुए शत्रु भाग गए हों और पुनः युद्ध करने के लिए आ रहे हों, तो उनसे डरना चाहिए, क्योंकि वे दृढ़ निश्चय कर चुके हैं (उस समय वे मृत्यु से भी नहीं डरते)’॥15॥   |   mahabharat अध्याय 9.58: श्रीकृष्ण और अर्जुनकी बातचीत तथा अर्जुनके संकेतके अनुसार भीमसेनका गदासे दुर्योधनकी जाँघें तोड़कर उसे धराशायी करना एवं भीषण उत्पातोंका प्रकट होना   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 58: श्रीकृष्ण और अर्जुनकी बातचीत तथा अर्जुनके संकेतके अनुसार भीमसेनका गदासे दुर्योधनकी जाँघें तोड़कर उसे धराशायी करना एवं भीषण उत्पातोंका प्रकट होना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  9.58.15 
पुनरावर्तमानानां भग्नानां जीवितैषिणाम्।
भेतव्यमरिशेषाणामेकायनगता हिते॥ १५॥
 
 
अनुवाद
‘यदि युद्ध में प्राण बचाने के लिए बचे हुए शत्रु भाग गए हों और पुनः युद्ध करने के लिए आ रहे हों, तो उनसे डरना चाहिए, क्योंकि वे दृढ़ निश्चय कर चुके हैं (उस समय वे मृत्यु से भी नहीं डरते)’॥15॥
 
‘If the enemies who survived the battle to save their lives have fled and are returning to fight again, then one should fear them because they have reached a firm resolve (at that time they are not even afraid of death)’॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)