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श्लोक 9.56.2-3  |
धिगस्तु खलु मानुष्यं यस्य निष्ठेयमीदृशी।
एकादशचमूभर्ता यत्र पुत्रो ममानघ॥ २॥
आज्ञाप्य सर्वान् नृपतीन् भुक्त्वा चेमां वसुंधराम्।
गदामादाय वेगेन पदाति: प्रस्थितो रणे॥ ३॥ |
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| अनुवाद |
| निर्दोष संजय! उस मनुष्य जन्म को धिक्कार है जिसका अंत इतना दुःखद है! मेरा पुत्र पहले ग्यारह अक्षौहिणी सेनाओं का स्वामी था। उसने समस्त राजाओं पर शासन किया और अकेले ही सम्पूर्ण पृथ्वी का उपभोग किया; किन्तु अन्त में उसकी ऐसी दशा हुई कि उसे हाथ में गदा लेकर पैदल ही युद्ध में जाना पड़ा॥ 2-3॥ |
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| ‘Innocent Sanjaya! Shame on that human birth whose end is so tragic! My son was once the master of eleven Akshauhini armies. He ruled over all the kings and enjoyed the entire earth single-handedly; but in the end his condition was such that he had to go to the battle on foot with a mace in his hand.॥ 2-3॥ |
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