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श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 54: प्लक्षप्रस्रवण आदि तीर्थों तथा सरस्वतीकी महिमा एवं नारदजीसे कौरवोंके विनाश और भीम तथा दुर्योधनके युद्धका समाचार सुनकर बलरामजीका उसे देखनेके लिये जाना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  9.54.1 
वैशम्पायन उवाच
कुरुक्षेत्रं ततो दृष्ट्वा दत्त्वा दायांश्च सात्वत:।
आश्रमं सुमहद् दिव्यमगमज्जनमेजय॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! सात्वतवंशी बलरामजी कुरुक्षेत्र में आये, वहाँ बहुत-सा धन दान किया और वहाँ से एक महान् एवं दिव्य आश्रम में चले गये।
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Satvatvanshi Balramji visited Kurukshetra, donated a lot of money there and went from that place to a great and divine ashram.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)