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श्लोक  9.51.6 
तस्यातितपस: शक्रो बिभेति सततं विभो।
न स लोभयितुं शक्य: फलैर्बहुविधैरपि॥ ६॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! उनकी घोर तपस्या से इन्द्र सदैव भयभीत रहते थे। नाना प्रकार के फल अर्पित करने पर भी वे उन्हें प्रसन्न नहीं कर पाते थे।
 
O Lord! Indra was always afraid of his intense penance. He could not be tempted even by offering various kinds of fruits.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)