श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 51: सारस्वततीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दधीच ऋषि और सारस्वत मुनिके चरित्रका वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  9.51.5 
वैशम्पायन उवाच
आसीत् पूर्वं महाराज मुनिर्धीमान् महातपा:।
दधीच इति विख्यातो ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन बोले, "महाराज! प्राचीन काल में एक बुद्धिमान और तपस्वी ऋषि थे, जो ब्रह्मचारी थे और अपनी इन्द्रियों को वश में रखते थे। उनका नाम दधीचि था।"
 
Vaishampayana said, "Maharaj! In ancient times there lived a wise and ascetic sage who was celibate and had controlled his senses. His name was Dadhichi.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)