श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 51: सारस्वततीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दधीच ऋषि और सारस्वत मुनिके चरित्रका वर्णन  »  श्लोक 40-41h
 
 
श्लोक  9.51.40-41h 
इत्युक्तस्तर्पयामास स पितॄन् देवतास्तथा॥ ४०॥
आहारमकरोन्नित्यं प्राणान् वेदांश्च धारयन्।
 
 
अनुवाद
सरस्वती की यह बात सुनकर सारस्वत ऋषि वहीं रहकर देवताओं और पितरों को तृप्त करने लगे। वे प्रतिदिन भोजन करते और अपने प्राणों तथा वेदों की रक्षा करते थे।
 
Upon hearing Saraswati say this, sage Saraswat stayed there and started satisfying the gods and ancestors. He used to eat food every day and protected his life and the Vedas. 40 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)