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mahabharat 9.50.61-62h: तब महर्षि देवल पुनः मन ही मन विचार करने लगे कि मेरे लिए मोक्ष या गृहस्थ धर्म, इनमें से कौन अधिक श्रेयस्कर होगा?   |   mahabharat अध्याय 9.50: आदित्यतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें असित देवल तथा जैगीषव्य मुनिका चरित्र   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 50: आदित्यतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें असित देवल तथा जैगीषव्य मुनिका चरित्र  »  श्लोक 61-62h
 
 
श्लोक  9.50.61-62h 
ततो भूयो व्यगणयत् स्वबुद्धॺा मुनिसत्तम:॥ ६१॥
मोक्षे गार्हस्थ्यधर्मे वा किं नु श्रेयस्करं भवेत्।
 
 
अनुवाद
तब महर्षि देवल पुनः मन ही मन विचार करने लगे कि मेरे लिए मोक्ष या गृहस्थ धर्म, इनमें से कौन अधिक श्रेयस्कर होगा?
 
Then the great sage Deval again began to ponder with his mind, which one would be better for me, salvation or the duty of a householder? 61 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)