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mahabharat 9.50.58-59h: दसों दिशाओं में विलाप करते हुए उन प्राणियों के करुणापूर्ण वचन सुनकर देवल ने मोक्षमार्ग (त्याग) को त्यागने का विचार किया। 58 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 9.50: आदित्यतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें असित देवल तथा जैगीषव्य मुनिका चरित्र   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 50: आदित्यतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें असित देवल तथा जैगीषव्य मुनिका चरित्र  »  श्लोक 58-59h
 
 
श्लोक  9.50.58-59h 
देवलस्तु वच: श्रुत्वा भूतानां करुणं तथा॥ ५८॥
दिशो दश व्याहरतां मोक्षं त्यक्तुं मनो दधे।
 
 
अनुवाद
दसों दिशाओं में विलाप करते हुए उन प्राणियों के करुणापूर्ण वचन सुनकर देवल ने मोक्षमार्ग (त्याग) को त्यागने का विचार किया। 58 1/2॥
 
Hearing the compassionate words of those creatures mourning in the ten directions, Devala thought of abandoning the path of salvation (renunciation). 58 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)