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mahabharat 9.50.5-6h: वे ऋषिगण सदैव ब्रह्मचर्य का पालन करने में तत्पर रहते थे। धर्म ही उनका सबसे बड़ा आधार था। हे भाग्यवान! एक दिन मुनि जैगीषव्य, जो तपस्वी थे, योग का आश्रय लेकर उस तीर्थस्थान पर आये और एकाग्रचित्त होकर वहीं रहने लगे।   |   mahabharat अध्याय 9.50: आदित्यतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें असित देवल तथा जैगीषव्य मुनिका चरित्र   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 50: आदित्यतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें असित देवल तथा जैगीषव्य मुनिका चरित्र  »  श्लोक 5-6h
 
 
श्लोक  9.50.5-6h 
ब्रह्मचर्यरतो नित्यं सदा धर्मपरायण:।
ततोऽभ्येत्य महाभाग योगमास्थाय भिक्षुक:॥ ५॥
जैगीषव्यो मुनिर्धीमांस्तस्मिंस्तीर्थे समाहित:।
 
 
अनुवाद
वे ऋषिगण सदैव ब्रह्मचर्य का पालन करने में तत्पर रहते थे। धर्म ही उनका सबसे बड़ा आधार था। हे भाग्यवान! एक दिन मुनि जैगीषव्य, जो तपस्वी थे, योग का आश्रय लेकर उस तीर्थस्थान पर आये और एकाग्रचित्त होकर वहीं रहने लगे।
 
Those sages were always ready to observe celibacy. Dharma was their biggest support at all times. O fortunate one! One day, the wise sage Jaigishavya, who was a hermit, came to that pilgrimage place taking refuge in Yoga and started living there with a concentrated mind. 5 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)