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काञ्चने लोष्ठभावे च समदर्शी महातपा:।
देवानपूजयन्नित्यमतिथींश्च द्विजै: सह॥ ४॥
अनुवाद
चाहे वह सोना हो या मिट्टी का ढेला, महान तपस्वी देवल दोनों को एक ही दृष्टि से देखते थे और प्रतिदिन देवताओं, ब्राह्मणों और अतिथियों की पूजा और सम्मान करते थे।
Be it gold or a lump of clay, the great ascetic Deval looked at both with the same vision and worshipped and honoured the gods, brahmins and guests every day.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥