Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 9.50.3: महाराज! उनमें ज़रा भी क्रोध नहीं था। वे अपनी स्तुति और निन्दा को एक समान समझते थे। सुखद और अप्रिय, दोनों ही स्थितियों में उनका भाव एक-सा रहता था। यमराज की तरह वे सभी को समान दृष्टि से देखते थे। | mahabharat अध्याय 9.50: आदित्यतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें असित देवल तथा जैगीषव्य मुनिका चरित्र । mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अक्रोधनो महाराज तुल्यनिन्दात्मसंस्तुति:।
प्रियाप्रिये तुल्यवृत्तिर्यमवत्समदर्शन:॥ ३॥
अनुवाद
महाराज! उनमें ज़रा भी क्रोध नहीं था। वे अपनी स्तुति और निन्दा को एक समान समझते थे। सुखद और अप्रिय, दोनों ही स्थितियों में उनका भाव एक-सा रहता था। यमराज की तरह वे सभी को समान दृष्टि से देखते थे।
Maharaj! There was no anger in him. He considered his praise and criticism to be the same. His attitude remained the same in the face of pleasant and unpleasant things. Like Yamraj, he looked equally at everyone.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥