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एवं विगणयन्नेव स मुनिर्मन्त्रपारग:॥ २४॥
उत्पपाताश्रमात् तस्मादन्तरिक्षं विशाम्पते।
जिज्ञासार्थं तदा भिक्षोर्जैगीषव्यस्य देवल:॥ २५॥
अनुवाद
प्रजानाथ! ऐसा विचार करके मन्त्रविद्या में पारंगत ऋषि आश्रम से आकाश की ओर उड़ चले। उन्होंने ऐसा जैगीषव्य मुनि की परीक्षा लेने के लिए किया।
Prajanath! Thinking thus, the sage, who was an expert in the science of mantras, flew away from the hermitage towards the sky. He did so to test the monk Jaigishavya. 24-25.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥