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mahabharat 9.50.2: वे सदैव धार्मिक, शुद्ध, आत्मसंयमी, किसी को दण्ड न देने वाले, महान तपस्वी तथा मन, वचन और कर्म से समस्त प्राणियों के प्रति समान भाव रखने वाले थे॥2॥   |   mahabharat अध्याय 9.50: आदित्यतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें असित देवल तथा जैगीषव्य मुनिका चरित्र   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 50: आदित्यतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें असित देवल तथा जैगीषव्य मुनिका चरित्र  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  9.50.2 
धर्मनित्य: शुचिर्दान्तो न्यस्तदण्डो महातपा:।
कर्मणा मनसा वाचा सम: सर्वेषु जन्तुषु॥ २॥
 
 
अनुवाद
वे सदैव धार्मिक, शुद्ध, आत्मसंयमी, किसी को दण्ड न देने वाले, महान तपस्वी तथा मन, वचन और कर्म से समस्त प्राणियों के प्रति समान भाव रखने वाले थे॥2॥
 
He was always religious, pure, self-controlled, never punished anyone, a great ascetic and had equal feelings towards all living beings in his thoughts, words and actions. ॥2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)