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mahabharat 9.50.18-19h: जनमेजय! फिर उन्होंने समुद्र में स्नान किया और जपने योग्य मंत्र का जप करके स्वयं को शुद्ध किया। जप आदि नित्य कर्म पूर्ण करके श्रीमान् देवल जल से भरा कलश लेकर अपने आश्रम में आए।   |   mahabharat अध्याय 9.50: आदित्यतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें असित देवल तथा जैगीषव्य मुनिका चरित्र   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 50: आदित्यतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें असित देवल तथा जैगीषव्य मुनिका चरित्र  »  श्लोक 18-19h
 
 
श्लोक  9.50.18-19h 
स्नात्वा समुद्रे विधिवच्छुचिर्जप्यं जजाप स:।
कृतजप्याह्निक: श्रीमानाश्रमं च जगाम ह॥ १८॥
कलशं जलपूर्णं वै गृहीत्वा जनमेजय।
 
 
अनुवाद
जनमेजय! फिर उन्होंने समुद्र में स्नान किया और जपने योग्य मंत्र का जप करके स्वयं को शुद्ध किया। जप आदि नित्य कर्म पूर्ण करके श्रीमान् देवल जल से भरा कलश लेकर अपने आश्रम में आए।
 
Janamejaya! Then he took a ritual bath in the ocean and purified himself by chanting the mantra that should be chanted. After completing the daily rituals like chanting, Shriman Deval came to his ashram carrying a pot filled with water. 18 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)