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mahabharat 9.50.16-17: तब परम तेजस्वी महर्षि असितदेवल को आश्चर्य के साथ-साथ चिन्ता भी हुई। वे सोचने लगे कि, 'ये मुनिगण इतने सवेरे यहाँ कैसे पहुँच गए? इन्होंने तो समुद्र में स्नान का कार्य भी पूर्ण कर लिया है।'॥16-17॥   |   mahabharat अध्याय 9.50: आदित्यतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें असित देवल तथा जैगीषव्य मुनिका चरित्र   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 50: आदित्यतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें असित देवल तथा जैगीषव्य मुनिका चरित्र  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  9.50.16-17 
तत: सविस्मयश्चिन्तां जगामाथामितप्रभ:॥ १६॥
कथं भिक्षुरयं प्राप्त: समुद्रे स्नात एव च।
इत्येवं चिन्तयामास महर्षिरसितस्तदा॥ १७॥
 
 
अनुवाद
तब परम तेजस्वी महर्षि असितदेवल को आश्चर्य के साथ-साथ चिन्ता भी हुई। वे सोचने लगे कि, 'ये मुनिगण इतने सवेरे यहाँ कैसे पहुँच गए? इन्होंने तो समुद्र में स्नान का कार्य भी पूर्ण कर लिया है।'॥16-17॥
 
Then the extremely brilliant Maharshi Asit Deval was worried as well as surprised. He started thinking, 'How did these monks reach here so early? They have even completed the task of bathing in the ocean.'॥ 16-17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)