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mahabharat 9.50.10-12h: भरत! वहाँ संन्यासी रूप में पधारे हुए महामुनि जैगीषव्य को देखकर देवल उनके प्रति बड़ा गर्व और प्रेम प्रकट करता था तथा अपनी शक्ति के अनुसार शास्त्रविधि से पूर्ण एकाग्रता से उनका पूजन (सम्मान) करता था। ऐसा उसने अनेक वर्षों तक किया।   |   mahabharat अध्याय 9.50: आदित्यतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें असित देवल तथा जैगीषव्य मुनिका चरित्र   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 50: आदित्यतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें असित देवल तथा जैगीषव्य मुनिका चरित्र  »  श्लोक 10-12h
 
 
श्लोक  9.50.10-12h 
स दृष्ट्वा भिक्षुरूपेण प्राप्तं तत्र महामुनिम्॥ १०॥
गौरवं परमं चक्रे प्रीतिं च विपुलां तथा।
देवलस्तु यथाशक्ति पूजयामास भारत॥ ११॥
ऋषिदृष्टेन विधिना समा बह्वी: समाहित:।
 
 
अनुवाद
भरत! वहाँ संन्यासी रूप में पधारे हुए महामुनि जैगीषव्य को देखकर देवल उनके प्रति बड़ा गर्व और प्रेम प्रकट करता था तथा अपनी शक्ति के अनुसार शास्त्रविधि से पूर्ण एकाग्रता से उनका पूजन (सम्मान) करता था। ऐसा उसने अनेक वर्षों तक किया।
 
Bharat! Seeing the great sage Jaigishavya who had come there as a Sanyasi, Deval used to show great pride and love towards him and used to worship him (respect him) with full concentration according to the scriptures as per his capability. He did this for many years.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)