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अध्याय 50: आदित्यतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें असित देवल तथा जैगीषव्य मुनिका चरित्र
 
श्लोक 1:  वैशम्पायन जी कहते हैं, 'हे जनमेजय! प्राचीन काल की कथा है, उसी तीर्थस्थान पर महान तपस्वी असितदेवल ऋषि गृहस्थ धर्म में रहते थे।
 
श्लोक 2:  वे सदैव धार्मिक, शुद्ध, आत्मसंयमी, किसी को दण्ड न देने वाले, महान तपस्वी तथा मन, वचन और कर्म से समस्त प्राणियों के प्रति समान भाव रखने वाले थे॥2॥
 
श्लोक 3:  महाराज! उनमें ज़रा भी क्रोध नहीं था। वे अपनी स्तुति और निन्दा को एक समान समझते थे। सुखद और अप्रिय, दोनों ही स्थितियों में उनका भाव एक-सा रहता था। यमराज की तरह वे सभी को समान दृष्टि से देखते थे।
 
श्लोक 4:  चाहे वह सोना हो या मिट्टी का ढेला, महान तपस्वी देवल दोनों को एक ही दृष्टि से देखते थे और प्रतिदिन देवताओं, ब्राह्मणों और अतिथियों की पूजा और सम्मान करते थे।
 
श्लोक 5-6h:  वे ऋषिगण सदैव ब्रह्मचर्य का पालन करने में तत्पर रहते थे। धर्म ही उनका सबसे बड़ा आधार था। हे भाग्यवान! एक दिन मुनि जैगीषव्य, जो तपस्वी थे, योग का आश्रय लेकर उस तीर्थस्थान पर आये और एकाग्रचित्त होकर वहीं रहने लगे।
 
श्लोक 6-7h:  महाराज! अत्यन्त तेजस्वी एवं महान तपस्वी जैगीषव्य ने सदैव योग में तत्पर रहकर सिद्धि प्राप्त की थी और देवल के आश्रम में रहते थे।
 
श्लोक 7-8:  यद्यपि महामुनि जैगीषव्य उस आश्रम में रहते थे, तथापि देवल मुनि ने उनके समक्ष धर्मानुसार योगाभ्यास नहीं किया। इस प्रकार उन दोनों ने वहाँ रहते हुए बहुत समय व्यतीत किया ॥7-8॥
 
श्लोक 9-10h:  जनमेजय! उसके बाद कुछ समय तक ऐसा हुआ कि देवल को जैगीषव्य ऋषि के दर्शन सर्वदा नहीं होते थे। धर्म में पारंगत ज्ञानी तपस्वी जैगीषव्य केवल भोजन करते समय या भिक्षा लेते समय ही देवल के पास आते थे॥9 1/2॥
 
श्लोक 10-12h:  भरत! वहाँ संन्यासी रूप में पधारे हुए महामुनि जैगीषव्य को देखकर देवल उनके प्रति बड़ा गर्व और प्रेम प्रकट करता था तथा अपनी शक्ति के अनुसार शास्त्रविधि से पूर्ण एकाग्रता से उनका पूजन (सम्मान) करता था। ऐसा उसने अनेक वर्षों तक किया।
 
श्लोक 12-13h:  हे मनुष्यों के स्वामी! एक दिन महाबली जैगीषव्य ऋषि को देखकर महात्मा देवल बहुत चिंतित हो गये।
 
श्लोक 13-14h:  उन्होंने सोचा, 'मुझे इनकी पूजा करते हुए बहुत वर्ष हो गए; परंतु उन आलसी भिक्षुओं ने आज तक एक शब्द भी नहीं कहा।'॥13 1/2॥
 
श्लोक 14-15h:  ऐसा विचार कर श्रीमान् देवलमुनि ने घड़ा हाथ में लिया और आकाश मार्ग से समुद्र तट की ओर चल पड़े।
 
श्लोक 15-16h:  भरत! समुद्र के पास पहुँचकर धर्मात्मा देवल ने देखा कि जैगीषव्य तो वहाँ जा चुके हैं।
 
श्लोक 16-17:  तब परम तेजस्वी महर्षि असितदेवल को आश्चर्य के साथ-साथ चिन्ता भी हुई। वे सोचने लगे कि, 'ये मुनिगण इतने सवेरे यहाँ कैसे पहुँच गए? इन्होंने तो समुद्र में स्नान का कार्य भी पूर्ण कर लिया है।'॥16-17॥
 
श्लोक 18-19h:  जनमेजय! फिर उन्होंने समुद्र में स्नान किया और जपने योग्य मंत्र का जप करके स्वयं को शुद्ध किया। जप आदि नित्य कर्म पूर्ण करके श्रीमान् देवल जल से भरा कलश लेकर अपने आश्रम में आए।
 
श्लोक 19-21h:  देवल मुनि ने आश्रम में प्रवेश करते ही जैगीषव्य को वहाँ बैठे देखा, किन्तु जैगीषव्य ने उस समय भी उनसे कोई बात नहीं की। वे महान तपस्वी मुनि चुपचाप भूमि पर बैठे रहे। 19-20 1/2।
 
श्लोक 21-22:  राजन! जब बुद्धिमान असितदेवल ने देखा कि समुद्र के समान प्रभावशाली एक मुनि समुद्र के जल में स्नान करके मेरे सामने आश्रम में आये हैं, तब वे पुनः अत्यन्त चिंतित हो गये।
 
श्लोक 23-24h:  राजेन्द्र! जैगीष्य की तपस्या का योग प्रभाव देखकर महर्षि देवल पुनः विचार करने लगे - 'मैंने अभी-अभी इन्हें समुद्रतट पर देखा है, फिर ये आश्रम में कैसे उपस्थित हैं?'॥23 1/2॥
 
श्लोक 24-25:  प्रजानाथ! ऐसा विचार करके मन्त्रविद्या में पारंगत ऋषि आश्रम से आकाश की ओर उड़ चले। उन्होंने ऐसा जैगीषव्य मुनि की परीक्षा लेने के लिए किया।
 
श्लोक 26:  शिखर पर पहुँचकर उन्होंने अनेक अंतरिक्ष यात्री सिद्धों को एकाग्रचित्त होकर देखा। साथ ही, उन्होंने उन सिद्धों द्वारा पूजित जैगीषव्य ऋषि को भी देखा।
 
श्लोक 27:  तदनन्तर व्रत में दृढ़ रहने वाले असितदेवल ऋषि अत्यन्त क्रोधित हो उठे और उन्होंने जैगीषव्य को स्वर्ग में जाते देखा॥ 27॥
 
श्लोक 28:  उसे स्वर्ग से पितृलोक और पितृलोक से यमलोक जाते देखा ॥28॥
 
श्लोक 29:  उस स्थान से भी ऊपर उठकर महामुनि जैगीषव्य जलयुक्त चन्द्रलोक की ओर जाते हुए दिखाई दिए।
 
श्लोक 30:  फिर वह एकान्त यज्ञ करनेवाले मनुष्यों के उत्तम लोकों की ओर उड़ता हुआ दिखाई दिया। वहाँ से वह अग्निहोत्रियों के लोकों में गया ॥30॥
 
श्लोक 31:  उन लोकों से ऊपर उठकर वे मुनिवर दर्श और पूर्णमास यज्ञ करने वाले तपस्वियों के लोक में गए और वहाँ से वे पशुबलि देने वालों के लोकों में जाते हुए दिखाई दिए ॥31॥
 
श्लोक 32:  देवल मुनि ने जैगीषव्य को उन तपस्वियों के निर्मल लोकों में जाते देखा, जो अनेक प्रकार के चातुर्मास यज्ञ करते हैं। वहाँ देवताओं द्वारा उनकी पूजा की जा रही थी।
 
श्लोक 33-34h:  वहां से देवल मुनि ने जैगीषव्य को देखा, जो अग्निष्टोमयाजी के लोक में पहुंचे थे और तपोधनों ने, जिन्होंने अग्निष्टुत यज्ञ के माध्यम से यज्ञ किया था। 33 1/2॥
 
श्लोक 34-35h:  उन्होंने उन महाज्ञानी पुरुषों के लोकों में भी जैगीषव्य को देखा जो बहुत सी स्वर्ण दक्षिणाओं से उत्तम वाजपेय यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं ॥34 1/2॥
 
श्लोक 35-36h:  राजसूय और पुण्डरीक यज्ञों द्वारा यज्ञ करने वालों के लोकों में भी देवल ने जैगीषव्य को देखा। 35 1/2
 
श्लोक 36-37h:  मैंने उसे समस्त मानव अनुष्ठानों में श्रेष्ठ अश्वमेध और नरमेध करने वालों के लोकों में भी देखा। ॥36 1/2॥
 
श्लोक 37-38h:  देवलने ने दुर्लभ सर्वमेध और सौत्रामणि यज्ञ करने वालों के लोक में जैगीषव्य को देखा।
 
श्लोक 38-39h:  नरेश्वर! देवल ने नाना प्रकार के द्वादशाह यज्ञ करने वालों के लोकों में जैगीषव्य को देखा।
 
श्लोक 39-40h:  तत्पश्चात् असित ने जैगीषव्य को मित्र, वरुण और आदित्य लोकों में पहुँचते देखा ॥39 1/2॥
 
श्लोक 40-41h:  इसके बाद, असित देवल ने जैगीषव्य को रुद्र, वसु और बृहस्पति के निवास से ऊपर उठते देखा।
 
श्लोक 41-42h:  इसके बाद असित ने गौओं के लोक में जाकर जैगीषव्य को ब्रह्मसत्र करने वालों के लोक में जाते देखा।
 
श्लोक 42-43h:  तत्पश्चात देवल ने देखा कि विप्रवर जैगीषव्य मुनि अपने तेज से ऊपर के तीनों लोकों को पार करके भक्तों के लोक में जा रहे हैं ॥42 1/2॥
 
श्लोक 43-44h:  हे शत्रुओं का दमन करने वाले राजन! इसके बाद असित ने जैगीषव्य ऋषि को किसी भी लोक में पुनः नहीं देखा। वे अदृश्य हो गए थे। 43 1/2
 
श्लोक 44-45h:  तत्पश्चात् महाभाग देवल ने जैगीषव्य नामक उत्तम व्रत तथा अद्वितीय योगसिद्धि के प्रभाव का विचार किया।
 
श्लोक 45-47h:  इसके बाद धैर्यवान असित ने हाथ जोड़कर उन लोकों में रहने वाले ब्रह्मयाजी सिद्धों और साधुओं से विनयपूर्वक पूछा - 'महात्माओं! मैं अब महाबली जैगीषव्य को नहीं देख पा रहा हूँ। कृपया मुझे उनका पता बताइए। मैं उनके विषय में सुनना चाहता हूँ। मैं इसके लिए बहुत उत्सुक हूँ।'॥45-46 1/2॥
 
श्लोक 47-48h:  सिद्धों ने कहा, "हे उत्तम व्रतों का दृढ़तापूर्वक पालन करने वाले देवल! सुनो। हम तुम्हें वह बात बता रहे हैं, जो घटित हो चुकी है। जैगीषव्य ऋषि सनातन ब्रह्मलोक को प्राप्त हो गए हैं।"
 
श्लोक 48-49:  वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन ! उन ब्रह्मयाजी सिद्धों के वचन सुनकर देवल मुनि तुरन्त ऊपर की ओर उछले, किन्तु नीचे गिर पड़े। तब उन सिद्धों ने पुनः देवल से कहा -॥48-49॥
 
श्लोक 50:  तपोधन देवल! विप्रवर! ब्रह्मलोक जहाँ जैगीश्वय गया है वहाँ जाने की शक्ति आपमें नहीं है। 50॥
 
श्लोक 51:  वैशम्पायनजी कहते हैं - हे राजन! उन सिद्धों के वचन सुनकर देवलमुनि पुनः उन समस्त लोकों में एक-एक करके भ्रमण करते हुए नीचे उतर आए।
 
श्लोक 52:  पक्षी की तरह उड़ते हुए वह अपने पवित्र आश्रम में पहुँच गया। आश्रम में प्रवेश करते ही देवल ने वहाँ ऋषि जैगीषव्य को बैठे देखा।
 
श्लोक 53:  तब देवल ने जैगीषव्य की तपस्या का योग प्रभाव देखकर धार्मिक मन से उसका चिंतन किया ॥53॥
 
श्लोक 54:  राजन! इसके बाद देवल महामुनि महात्मा जैगीषव्य के पास गये और नम्रता से बोले- 54॥
 
श्लोक 55-57h:  प्रभु! मैं मोक्षरूपी धर्म की शरण लेना चाहता हूँ।' उनके वचन सुनकर महातपस्वी जैगीषव्य ने उनके संन्यास लेने का अभिप्राय जानकर उन्हें ज्ञान का उपदेश दिया। साथ ही उन्होंने योग की उत्तम विधि का भी उपदेश दिया तथा शास्त्रानुसार कर्तव्य-अकर्तव्यों का भी उपदेश दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने उनके संन्यास लेने से संबंधित सभी कार्य (दीक्षा और संस्कार आदि) भी शास्त्रविधि के अनुसार संपन्न किए। ॥55-56 1/2॥
 
श्लोक 57-58h:  उनके संन्यास लेने का इरादा जानकर पितरोंसहित समस्त प्राणी रोने लगे और कहने लगे, 'अब हमें कौन उचित रीति से भोजन कराएगा?'॥57 1/2॥
 
श्लोक 58-59h:  दसों दिशाओं में विलाप करते हुए उन प्राणियों के करुणापूर्ण वचन सुनकर देवल ने मोक्षमार्ग (त्याग) को त्यागने का विचार किया। 58 1/2॥
 
श्लोक 59-61h:  भरत! यह देखकर हजारों फल, मूल, पवित्र घास, फूल और औषधियाँ बार-बार रोने लगीं और कहने लगीं कि 'यह दुष्ट बुद्धिवाला क्षुद्र देवल अवश्य ही पुनः हमारा विनाश करेगा। इसीलिए समस्त प्राणियों को अभयदान देकर भी अब इसे अपनी प्रतिज्ञा याद नहीं रहती।'॥59-60 1/2॥
 
श्लोक 61-62h:  तब महर्षि देवल पुनः मन ही मन विचार करने लगे कि मेरे लिए मोक्ष या गृहस्थ धर्म, इनमें से कौन अधिक श्रेयस्कर होगा?
 
श्लोक 62-63h:  हे राजन! इस बात को मन में विचारकर देवल ने गृहस्थ धर्म त्यागकर मोक्ष धर्म को अपना लिया।
 
श्लोक 63-64h:  भरत! इन सब बातों पर विचार करके देवल ने संन्यास लेने का निश्चय किया। ऐसा करके उसे परम सिद्धि और उत्तम योग की प्राप्ति हुई।
 
श्लोक 64-65h:  तब बृहस्पति सहित सभी देवता और तपस्वीगण वहाँ आये और जैगीषव्य ऋषि की तपस्या की प्रशंसा करने लगे।
 
श्लोक 65-66h:  तत्पश्चात् महर्षि नारद ने देवताओं से कहा, 'जैगीषव्य तपस्या नहीं कर रहे हैं, क्योंकि असित अपनी शक्ति दिखाकर ऋषियों को आश्चर्यचकित कर रहे हैं।'
 
श्लोक 66-68h:  महामुनि जैगीष्य की इस प्रकार प्रशंसा करते हुए नारदजी ने जो कहा, उसे देवताओं ने उत्तर दिया - 'आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि प्रभाव, तेज, तप और योग की दृष्टि से इस महात्मा से बढ़कर कोई नहीं है।' 66-67 1/2
 
श्लोक 68:  ऐसा था पुण्यशाली जैगीषव्य और असित मुनि का प्रभाव। उन दो महान आत्माओं का यह महान स्थान एक तीर्थस्थल है।
 
श्लोक 69:  परोपकारी कर्म करने वाले महात्मा हलधर वहाँ स्नान करके, ब्राह्मणों को दान देकर तथा अपने धर्म का फल प्राप्त करके महान एवं उत्तम तीर्थ सोम को चले गए। 69।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)